गुरूवार, 16 जुलाई 2026 | IST

बरघाट प्रकरण: कवि-संचालक को हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत, रामचरितमानस बना आधार : एड. विशाल वी.आर. डेनियल व अपूर्वा सिंह राजपूत की दलीलों पर हाईकोर्ट ने राहत देते हुए धार्मिक वैमनस्य की मंशा नहीं मानी।

Khabri Chacha

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एड. विशाल वी.आर. डेनियल व अपूर्वा सिंह राजपूत की दलीलों पर हाईकोर्ट ने राहत देते हुए धार्मिक वैमनस्य की मंशा नहीं मानी।

जबलपुर/सिवनी। सिवनी जिले के बरघाट थाना क्षेत्र में दर्ज बहुचर्चित प्रकरण में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने कवि एवं मंच संचालक संदीप कुमार को बड़ी राहत देते हुए अग्रिम जमानत प्रदान कर दी है। न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की एकलपीठ ने 16 जुलाई 2026 को पारित आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि आवेदक की मंशा धार्मिक भावनाएं भड़काने या समाज में वैमनस्य फैलाने की थी।

मामला बरघाट थाना के अपराध क्रमांक 359/2026 से संबंधित है, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353(2) एवं 353(3) के तहत प्रकरण दर्ज किया गया था। आरोप था कि एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान मंच संचालन करते हुए आवेदक ने भगवान श्रीराम एवं माता सीता के संबंध में आपत्तिजनक टिप्पणी की।

बचाव पक्ष ने रखा रामचरितमानस का संदर्भ

आवेदक की ओर से अधिवक्ता विशाल वी. आर. डेनियल एवं अधिवक्ता अपूर्वा सिंह राजपूत ने न्यायालय में पक्ष रखा। उन्होंने तर्क दिया कि मंच से कही गई बातें गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस के सुंदरकांड में वर्णित मंदोदरी-रावण संवाद पर आधारित थीं। न्यायालय के समक्ष संबंधित दोहा भी प्रस्तुत किया गया—

"तव कुल कमल विपिन दुखदाई।

सीता सीत निसा सम आई॥"

बचाव पक्ष ने कहा कि आवेदक लंका की भयभीत महिलाओं के संवाद का वर्णन कर रहा था, न कि स्वयं माता सीता के प्रति अपमानजनक टिप्पणी। साथ ही, आपत्ति होने पर उसने सार्वजनिक रूप से क्षमा भी मांग ली थी।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय के Amish Devgan बनाम Union of India (2021) तथा Imran Pratapgarhi बनाम State of Gujarat (2026) के निर्णयों का हवाला दिया। इन फैसलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, साहित्य, कविता, मंचीय प्रस्तुति एवं कलात्मक अभिव्यक्ति के संवैधानिक संरक्षण पर विस्तार से विचार किया गया है।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वीडियो देखने से स्पष्ट होता है कि आवेदक लंका की महिलाओं के बीच हो रही चर्चा का वर्णन कर रहा था। शब्दों का चयन उचित न माना जा सकता है, लेकिन इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी मंशा जनता की धार्मिक भावनाओं को आहत करने या धर्म के आधार पर शत्रुता, दंगा अथवा वैमनस्य फैलाने की थी।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि संबंधित अपराध अधिकतम तीन वर्ष तक के दंड से दंडनीय है तथा मामले के तथ्यों और उपलब्ध सामग्री को देखते हुए आवेदक को अग्रिम जमानत दिए जाने का आधार बनता है।

50 हजार के निजी मुचलके पर मिली राहत

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में आवेदक को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके एवं समान राशि के एक सक्षम जमानतदार पर रिहा किया जाए। साथ ही, उसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 482(2) में निर्धारित सभी शर्तों का पालन करना होगा।

यह आदेश सिवनी-बरघाट के बहुचर्चित प्रकरण में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेष रूप से इसलिए क्योंकि न्यायालय ने प्रथम दृष्टया मंचीय प्रस्तुति के संदर्भ, पौराणिक प्रसंग और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए आवेदक को राहत प्रदान की है।

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