राम मंदिर की करोड़ों की संपत्ति पर दो नामों का खेल? : 11.60 एकड़ कृषि भूमि, मंदिर की आय, सहकारी समिति, राजस्व रिकॉर्ड और हाईकोर्ट की याचिकाओं ने खड़े किए कई सवाल
Khabri Chacha
नैनपुर/मंडला | विशेष संवाददाता
क्या मध्यप्रदेश शासन के मंदिर की कृषि भूमि जिसके प्रंबधक कलेक्टर मंडला और उसकी टॄस्ट पंजी मंडला के अनुविभागीय अधिकारी राजस्व के कार्यालय में हैं।वर्ष 1928 राजस्व अभिलेखों में लगान माफ दर्ज है।वह देवता के नाम की जमीन पर हर साल फसल उगती रही,मंदिर में चढ़ावा भी आता रहा, सहकारी समिति भी चलती रही, लेकिन मंदिर के नाम पर आय का कोई पारदर्शी हिसाब नहीं रखा गया? क्या मंदिर की कृषि भूमि और संपत्तियों को निजी नामों पर दर्ज कराने के लिए वर्षों से अलग-अलग स्तर पर प्रयास होते रहे?
मंडला जिले के नैनपुर स्थित भगवान श्री लक्ष्मीनारायण (राम मंदिर) और भगवान श्री राधाकृष्ण मंदिर से जुड़ा मामला अब केवल राजस्व विवाद नहीं रह गया है। शिकायतकर्ता द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्य सचिव, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग, आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW), कमिश्नर, कलेक्टर तथा अन्य विभागों को भेजे गए दस्तावेजों में ऐसे कई तथ्य सामने रखे गए हैं, जिनसे मंदिर की कृषि भूमि, मंदिर की आय, सहकारी समिति, राजस्व अभिलेखों में बदलाव तथा हाईकोर्ट में लंबित याचिकाओं को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि इन सभी मामलों की एक साथ निष्पक्ष जांच कराई जाए तो मंदिर की संपत्तियों से जुड़ा पूरा घटनाक्रम सामने आ सकता है।

11.60 एकड़ कृषि भूमि... लेकिन वर्षों की कृषि आय का हिसाब कहाँ?
शिकायतकर्ता के अनुसार पटवारी हल्का क्रमांक-34, खसरा क्रमांक-8, रकबा 4.6960 हेक्टेयर (लगभग 11.60 एकड़) भूमि भगवान श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर प्रंबधक कलेक्टर मंडला के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज है। उपलब्ध गिरदावरी रिकॉर्ड में वर्ष दर वर्ष खरीफ और रबी दोनों मौसमों में धान, गेहूं, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों का उल्लेख मिलता है। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि वर्षों से नियमित खेती होती रही, तो मंदिर की कृषि आय कितनी हुई, वह किस खाते में जमा हुई और उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया गया, इसका सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध क्यों नहीं है? शिकायतकर्ता ने वर्ष 2000 से अब तक की कृषि आय का विशेष ऑडिट कराने की मांग की है।
मंदिर के प्रबंधक कलेक्टर, फिर भी आय-व्यय पर सवाल क्यों?
राजस्व अभिलेखों के अनुसार मंदिर की संपत्ति के प्रबंधक के रूप में जिला कलेक्टर का नाम दर्ज है। शिकायतकर्ता का कहना है कि सार्वजनिक धार्मिक न्यास की संपत्ति होने के कारण मंदिर के बैंक खाते, चढ़ावा, कृषि आय, आय-व्यय रजिस्टर और ऑडिट रिपोर्ट का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए। उनका आरोप है कि यदि इतने वर्षों तक नियमित खेती हुई और मंदिर में चढ़ावा भी आता रहा, तो उसकी पारदर्शी लेखा व्यवस्था क्यों नहीं दिखाई देती। उन्होंने विशेष वित्तीय ऑडिट कराए जाने की मांग की है।
हाईकोर्ट में दो नामों से याचिकाएँ? शिकायत में बड़ा दावा
शिकायतकर्ता का सबसे गंभीर दावा यह है कि शरदचंद्र वैष्णव तथा रामभजन वैष्णव नामों से जबलपुर हाईकोर्ट में अलग-अलग याचिकाएँ दायर की गईं। शिकायत में कहा गया है कि शरदचंद्र वैष्णव के नाम से WP 1219/2013, WA 237/2014, रामभजन वैष्णव के नाम से SA 562/2016 तथा WP 27017/2022 याचिका प्रकरण की मंदिर और उसकी कृषि भूमि से लगाई गई है। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि न्यायालय में प्रस्तुत दस्तावेजों और पहचान संबंधी रिकॉर्ड का परीक्षण कर यह स्पष्ट किया जाए कि क्या दोनों नाम एक ही व्यक्ति से संबंधित हैं। इस दावे की अभी किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा पुष्टि नहीं हुई है।
2011 में मंदिर का नाम हटाया गया, 2013 में फिर दर्ज हुआ
शिकायतकर्ता के अनुसार वर्ष 2011 में पारित एक राजस्व आदेश के माध्यम से मंदिर की मूर्ति और प्रबंधक कलेक्टर का नाम राजस्व रिकॉर्ड से हटाया गया था। शिकायत में दावा किया गया है कि यह कार्रवाई नियमों के अनुरूप नहीं थी। बाद में वर्ष 2013 में पुनर्विलोकन के बाद तत्कालीन कलेक्टर के आदेश से मंदिर का नाम और प्रबंधक कलेक्टर का नाम पुनः दर्ज किया गया। शिकायतकर्ता ने पूछा है कि यदि पहली कार्रवाई सही थी तो पुनः नाम क्यों जोड़ा गया, और यदि पुनर्विलोकन सही था तो पहली कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी थी?

नवदुर्गा बीज उत्पादक सहकारी समिति भी जांच के घेरे में
शिकायतकर्ता ने नवदुर्गा बीज उत्पादक सहकारी समिति क्रमांक 833 उमरिया के गठन को भी पूरे मामले से जोड़ा है। उनका कहना है कि समिति के पंजीयन दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच की जानी चाहिए। शिकायतकर्ता के अनुसार समिति के अभिलेखों में गीता पति शिवचरण तथा शिवचरण पिता दयाराम जैसे नाम दर्ज हैं और सदस्यता की वैधानिकता की जांच आवश्यक है। शिकायत में यह भी कहा गया है कि समिति के गठन के समय एक सदस्य सरकारी सेवा में था, नैनपुर में पदस्थ नहीं था वह सिंचाई विभाग बाबू के पद में छिन्दवाड़ा जिले में पदस्थ रहा तथा उसके नाम निजी कृषि भूमि भी नहीं थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि मंदिर नैनपुर में मध्यप्रदेश शासन का वार्ड क्रमांक 04 खसरा नंबर 371 रकबा 0.2430 हेक्टेयर की मूर्ति देवता के नाम भगवान लक्ष्मीनारायण प्रंबधक कलेक्टर मंडला के नाम दर्ज की एक ही खसरा क्रमांक-8 रकबा 4.6960 को आधार बनाकर सदस्यता और पात्रता दर्शाई गई। इन दावों की पुष्टि राजस्व रिकार्ड अभिलेखो एवं नव दुर्गा बीज उत्पादक सहकारी समिति के गंठन के दस्तावेजो की जांच से स्पष्ट हो जाएगी।
समिति को वर्षों तक मिला DAP और यूरिया, अब वितरण रिकॉर्ड की भी मांग दस्तावेजों के अनुसार
समिति को वर्ष 2012-13 से 2022-23 तक डीएपी 1244.600 मैं.टन और यूरिया 4973.420 मैं.टन का आवंटन हुआ। शिकायतकर्ता का कहना है कि इसकी भी जांच होनी चाहिए कि कितना उर्वरक प्राप्त हुआ, किन किसानों को वितरित किया गया, स्टॉक रजिस्टर और बिक्री रजिस्टर क्या बताते हैं तथा क्या पूरा वितरण नियमों के अनुरूप हुआ।
धर्मशाला, मंदिर की दूसरी भूमि और निर्माण गतिविधियों पर भी सवाल
शिकायतकर्ता ने वार्ड क्रमांक-4 स्थित मंदिर परिसर, पुरानी धर्मशाला और उससे लगी भूमि के उपयोग को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि मंदिर की संपत्ति का उपयोग मूल उद्देश्य से अलग किया गया है या किसी निर्माण कार्य में नियमों का पालन नहीं हुआ, तो इसकी भी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल
यदि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप सही हैं, तो यह मामला केवल एक भूमि विवाद नहीं बल्कि मंदिर की संपत्तियों, कृषि आय, राजस्व रिकॉर्ड, सहकारी समिति और सार्वजनिक धार्मिक न्यास के प्रबंधन से जुड़ा व्यापक प्रशासनिक मामला हो सकता है। दूसरी ओर, यदि जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं होती, तो वह भी स्पष्ट हो जाएगा। फिलहाल पूरे मामले का सच केवल सक्षम जांच से ही सामने आ जाएगी।