बुधवार, 26 अगस्त 2026 | IST

नैनपुर में मुक्तिधाम की व्यवस्था पर बढ़ते सवाल, जनता और नगर पालिका आमने-सामने : गौशाला विवाद से बिगड़ी मुक्तिधाम की व्यवस्था, मुख्य गेट पर ताला लगने से परिजन परेशान—क्या चुनाव में जनता देगी जवाब?

Khabri Chacha

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गौशाला विवाद से बिगड़ी मुक्तिधाम की व्यवस्था, मुख्य गेट पर ताला लगने से परिजन परेशान—क्या चुनाव में जनता देगी जवाब?

नैनपुर। नगर के मुक्तिधाम को लेकर चल रहा विवाद अब केवल गौशाला की व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है। मुक्तिधाम की व्यवस्था और उसकी गरिमा को लेकर जनता में बढ़ती नाराजगी अब राजनीतिक चर्चा का विषय भी बनती जा रही है। बुधवार को दो लोगों के अंतिम संस्कार के बाद परिजनों को मुक्तिधाम के मुख्य गेट पर ताला लगा होने के कारण परेशानी का सामना करना पड़ा। अग्नि संस्कार के बाद होने वाली रस्मों के लिए परिजन प्रवेश का इंतजार करते रहे।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि नैनपुर के मुक्तिधाम में वर्षों से अंतिम संस्कार होते आए हैं, लेकिन गौशाला विवाद के बाद पहली बार ऐसी स्थिति देखने को मिल रही है कि अंतिम संस्कार के लिए आने वाले परिजनों को ही प्रवेश के लिए परेशानी उठानी पड़ रही है। बताया जा रहा है कि गौशाला के लिए अलग गेट की व्यवस्था है, इसके बावजूद मुख्य गेट पर ताला लगा होना नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

मुक्तिधाम की गरिमा पर भी उठे सवाल

मुक्तिधाम परिसर में नगर पालिका की गौशाला को लेकर पहले से विवाद चल रहा है। गौवंश की लगातार मौतों, गौशाला की व्यवस्थाओं, चिता की राख तक गौवंश की पहुंच और उसी परिसर में मृत गौवंश को दफनाए जाने की घटनाओं के बाद अब मुख्य गेट पर ताला लगने की घटना ने नागरिकों की नाराजगी और बढ़ा दी है।

नागरिकों का कहना है कि मुक्तिधाम किसी राजनीतिक या प्रशासनिक खींचतान का स्थान नहीं, बल्कि लोगों की अंतिम भावनाओं से जुड़ा स्थल है। इसलिए इसकी व्यवस्था किसी भी विवाद से ऊपर रखी जानी चाहिए।

नगर पालिका के अंदर भी असहजता की चर्चा

स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि नगर पालिका के कुछ कर्मचारी जनता और नगर पालिका के कुछ जनप्रतिनिधियों के बीच चल रहे विवाद को अपना “सरदर्द” बता चुके हैं तथा नागरिकों की मांगों को जायज मानते हैं। हालांकि जनप्रतिनिधियों के सामने खुलकर अपनी बात रखने में वे असहज महसूस कर रहे हैं।

यदि यह स्थिति है तो सवाल यह है कि जब जनता की मांग और कर्मचारियों की जमीनी समझ में समानता दिखाई दे रही है, तो समाधान के स्तर पर इतना गतिरोध क्यों है?

पिछले चुनाव के आंकड़े भी चर्चा में

नगर की राजनीतिक चर्चाओं में पिछला नगर निकाय चुनाव भी अब इस विवाद के साथ जोड़ा जाने लगा है। स्थानीय राजनीतिक दावों के अनुसार पिछले चुनाव में भाजपा 15 वार्डों में से केवल 4 वार्डों में जीत हासिल कर पाई थी, जबकि बाद में दल-बदल की राजनीतिक परिस्थितियों के चलते भाजपा समर्थित परिषद के गठन की स्थिति बनी।

अब नागरिक और राजनीतिक विश्लेषक यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि मुक्तिधाम जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जनता की नाराजगी लगातार बढ़ती रही तो क्या इसका राजनीतिक असर आगामी चुनाव में देखने को मिलेगा?

कुछ लोग इसे भाजपा के लिए चेतावनी मान रहे हैं और सवाल कर रहे हैं कि क्या मुक्तिधाम को लेकर चल रही राजनीति भाजपा के लिए इतनी महंगी पड़ सकती है कि आने वाले चुनाव में पार्टी अपना खाता खोलने के लिए भी संघर्ष करती नजर आए?

हालांकि यह अभी राजनीतिक अनुमान है और चुनाव का परिणाम जनता के मतदान से ही तय होगा।

“श्मशान में राजनीति” कहीं चुनावी नुकसान का कारण न बन जाए

नागरिकों का कहना है कि गौशाला की समस्या का समाधान निकालना जरूरी है, लेकिन इसके लिए मुक्तिधाम की मूल व्यवस्था और गरिमा से समझौता नहीं होना चाहिए। यदि विवाद लंबा खिंचता है और आम नागरिकों को अंतिम संस्कार जैसे संवेदनशील समय में भी परेशानी होती है, तो इसका राजनीतिक असर होना स्वाभाविक है।

अब नैनपुर में चर्चा का सवाल यही बनता जा रहा है—

क्या मुक्तिधाम की राजनीति भाजपा को “मुक्तिधाम” तक पहुंचा रही है?

या फिर नगर पालिका समय रहते गौशाला विवाद का स्थायी समाधान निकालकर जनता की नाराजगी को शांत कर पाएगी?

फिलहाल इतना तय है कि मुक्तिधाम अब केवल एक स्थान नहीं, बल्कि नैनपुर की राजनीति और नगर पालिका की कार्यप्रणाली का बड़ा सवाल बन चुका है। आने वाला चुनाव बताएगा कि जनता इस पूरे घटनाक्रम को किस नजर से देखती है।

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