नैनपुर नगर पालिका में अपनों की बगावत, PIC बैठक से पार्षदों का बहिष्कार : अध्यक्ष पर एकतरफा फैसलों के आरोप, पार्षद बोले—जनहित के बजाय निजी हित को प्राथमिकता; चुनाव से पहले बढ़ी खींचतान
Khabri Chacha
नैनपुर। नैनपुर नगर पालिका परिषद में अध्यक्ष और सत्ताधारी दल के पार्षदों के बीच चल रही खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। 15 सितंबर को आयोजित प्रेसिडेंट-इन-काउंसिल (PIC) की बैठक को लेकर पार्षदों में पहले से ही नाराजगी थी। बैठक में सत्ताधारी दल के अधिकांश पार्षदों के दूरी बनाए रखने के बाद परिषद की अंदरूनी राजनीति और गरमा गई है।
पार्षदों के विरोध के चलते PIC बैठक में सत्ताधारी दल की ओर से केवल एक पार्षद के मौजूद रहने की बात सामने आई है। इससे बैठक की प्रभावशीलता पर सवाल उठे और अध्यक्ष को भी असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। अब सवाल यह है कि इस घटनाक्रम के बाद भारतीय जनता पार्टी संगठन स्तर पर क्या कदम उठाएगी और क्या पार्टी अध्यक्ष तथा नाराज पार्षदों के बीच समन्वय कराने का प्रयास करेगी?
‘भ्रष्टाचार चरम पर’—पार्षद का आरोप
नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर भाजपा के एक पार्षद ने आरोप लगाया कि नगर पालिका में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया है और जनता परेशान है। पार्षद के अनुसार, “हम जनता को मुंह नहीं दिखा पा रहे हैं। अध्यक्ष द्वारा वार्डों के काम रुकवाए जा रहे हैं, जिससे पार्षदों को अपने ही क्षेत्रों में लोगों के सवालों का सामना करना पड़ रहा है।”
पार्षद ने यह भी आरोप लगाया कि नगर पालिका में लिए जा रहे कई निर्णय जनहित को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि निजी हितों को प्राथमिकता देकर किए जा रहे हैं। उनका कहना है कि पार्षदों की आपत्तियों और सुझावों को नजरअंदाज किया जा रहा है तथा PIC में एकतरफा निर्णय लिए जा रहे हैं।
PIC छोड़ने तक की चर्चा
सूत्रों के अनुसार, नाराज पार्षद अब PIC से अलग होने तक का कदम उठाने पर विचार कर रहे हैं। पार्षदों का कहना है कि यदि उन्हें विश्वास में लेकर निर्णय नहीं किए गए और वार्डों के विकास कार्यों को आगे नहीं बढ़ाया गया तो वे सामूहिक रूप से अपनी असहमति दर्ज करा सकते हैं।
इस घटनाक्रम से भाजपा के सामने भी असहज स्थिति पैदा हो गई है। एक ओर पार्टी के पार्षद अध्यक्ष के खिलाफ गंभीर आरोप लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संगठन के लिए परिषद में अनुशासन और आपसी समन्वय बनाए रखना चुनौती बन गया
अब भाजपा क्या करेगी?
नगर पालिका में बढ़ते विवाद के बाद भाजपा संगठन के सामने कई विकल्प हैं। पार्टी वरिष्ठ नेताओं या संगठन पदाधिकारियों के माध्यम से अध्यक्ष और नाराज पार्षदों के बीच बातचीत करा सकती है। साथ ही, लगाए गए भ्रष्टाचार और विकास कार्यों से जुड़े आरोपों की आंतरिक स्तर पर जानकारी जुटाई जा सकती है।
यदि पार्षदों की नाराजगी दूर नहीं हुई तो मामला जिला या प्रदेश संगठन तक पहुंच सकता है। ऐसे में भाजपा को यह तय करना होगा कि वह अध्यक्ष के पक्ष में खड़ी होती है, पार्षदों की शिकायतों की जांच कराती है या दोनों पक्षों के बीच समझौते का रास्ता अपनाती है।
चुनाव से पहले बढ़ी चिंता
अगले वर्ष होने वाले नगर पालिका चुनाव से पहले भाजपा के लिए यह विवाद राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्षदों की नाराजगी यदि सार्वजनिक विरोध में बदलती है तो इसका असर पार्टी की छवि और चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है। वहीं, जनता से जुड़े कामों में देरी और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर विपक्ष को भी सरकार और भाजपा पर सवाल उठाने का मौका मिल सकता है।
फिलहाल अध्यक्ष, नगर पालिका प्रशासन और भाजपा संगठन की ओर से पार्षदों द्वारा लगाए गए आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। भ्रष्टाचार, काम रोकने और निजी हितों को प्राथमिकता देने संबंधी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।