गुरूवार, 9 जुलाई 2026 | IST
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नैनपुर : कलेक्टर के प्रबंधन में 'लक्ष्मीनारायण' के दर पर *'लक्ष्मी' की लूट!* : लक्ष्मीनारायण मंदिर की 11.60 एकड़ भूमि पर अंधेरगर्दी शासन और कलेक्टर को गुमराह कर वर्षों से जारी है कृषि आय का खुला गबन

admin

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लक्ष्मीनारायण मंदिर की 11.60 एकड़ भूमि पर अंधेरगर्दी शासन और कलेक्टर को गुमराह कर वर्षों से जारी है कृषि आय का खुला गबन

सरकारी गिरदावरी रिपोर्ट ने खोले राज: कागजों में होती रही खेती, खजाना रहा खाली।

नैनपुर/मंडला। नैनपुर स्थित भगवान श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर की 11.60 एकड़ (खसरा क्रमांक 08) बेशकीमती भूमि इन दिनों एक बड़े घोटाले की भेंट चढ़ती दिखाई दे रही है। राजस्व रिकॉर्ड में यह भूमि सीधे तौर पर मंदिर के नाम दर्ज है और इसका प्रबंधन जिला कलेक्टर के अधीन आता है। बावजूद इसके, वर्षों से इस भूमि पर की जा रही खेती और उससे प्राप्त होने वाली लाखों की आय का कहीं कोई अता-पता नहीं है। यह मामला न केवल मंदिर की संपत्ति के प्रबंधन में बरती जा रही गंभीर लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि शासन और स्थानीय प्रशासन को सुनियोजित तरीके से गुमराह करने का एक ज्वलंत उदाहरण बन गया है।

सरकारी दस्तावेजों में 'सफेद झूठ' और गिरदावरी के पुख्ता प्रमाण

राजस्व विभाग द्वारा ही तैयार की गई 'गिरदावरी' रिपोर्ट इस मामले के सबसे बड़े साक्ष्य के रूप में सामने आई है। रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2021 से 2025 तक, प्रत्येक रबी और खरीफ सीजन में इस भूमि पर धान, गेहूं, मक्का और सोयाबीन की सघन फसल ली गई है। 4.696 हेक्टेयर की पूरी भूमि को हर सीजन में 'सिंचित' दर्शाया गया है, जो यह प्रमाणित करता है कि यहाँ फसल उत्पादन व्यावसायिक स्तर पर हो रहा था। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारी दस्तावेजों में बंपर पैदावार दर्ज है, तो आखिर मंदिर के नाम से संचालित बैंक खातों में यह आय क्यों नहीं पहुंची? यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि मंदिर की आय को शासन की नजरों से छिपाकर निजी स्वार्थों के लिए इस्तेमाल किया गया है।



प्रशासनिक जवाबदेही पर 'खामोशी' और गुमराह करने का षड्यंत्र

मंदिर की भूमि के प्रबंधक के रूप में जिला कलेक्टर की भूमिका सर्वोच्च होती है। यदि मंदिर की भूमि पर वर्षों से व्यावसायिक खेती हो रही है, तो प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी? गिरदावरी में फसल का स्पष्ट ब्यौरा दर्ज होने के बावजूद आय-व्यय का कोई ऑडिट न होना, प्रशासन को गुमराह करने के एक गहरे षड्यंत्र की ओर इशारा करता है। स्थानीय स्तर पर इन तथ्यों को दबाए रखना यह सिद्ध करता है कि मंदिर की संपत्ति के प्रबंधन में एक बड़ा प्रशासनिक 'शून्य' है, जिसका लाभ उठाकर भू-माफिया और उनके मददगारों ने मंदिर की आय को अपनी निजी कमाई का जरिया बना लिया है।

निजी हितधारकों की संदिग्ध भूमिका और 'स्पेशल ऑडिट' की दरकार

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मंदिर की इस भूमि पर दशकों से सर्वराहकार, उनके पुत्र श्री राजू वैष्णव और नैनपुर निवासी अर्जुन नरवरे, भीम नरवरे एवं शिवचरण नरवरे जैसे व्यक्तियों का वर्चस्व रहा है। इन व्यक्तियों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि किस वैधानिक अधिकार के तहत इन्होंने मंदिर की भूमि पर मालिकाना हक जैसा व्यवहार किया? इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अब केवल सामान्य जांच पर्याप्त नहीं है। मंदिर की संपत्ति की सुरक्षा के लिए वर्ष 2000 से लेकर अब तक के समस्त वित्तीय अभिलेखों का 'स्पेशल ऑडिट' अनिवार्य हो गया है, ताकि गबन की गई राशि का सटीक आकलन हो सके।

धार्मिक आस्था और साक्ष्यों के संरक्षण की विकट चुनौती

यह मामला महज भूमि विवाद का नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था और मंदिर की पवित्र संपत्ति के संरक्षण का है। वर्तमान में भी खेत में फसल खड़ी है, जिसे लेकर आशंका जताई जा रही है कि यदि प्रशासन ने इसे अपने नियंत्रण में नहीं लिया, तो साक्ष्यों को नष्ट कर दिया जाएगा। जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए, प्रशासन को न केवल दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, बल्कि मंदिर की आय के लिए पारदर्शी व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी चाहिए। श्रद्धालुओं का स्पष्ट मानना है कि मंदिर की भूमि की आय केवल मंदिर के विकास और जनहित में ही व्यय होनी चाहिए, न कि किसी निजी व्यक्ति की तिजोरी भरने के लिए। प्रशासन की अब यह अग्निपरीक्षा है कि वह इस 'लैंड स्कैम' का पर्दाफाश करता है या चुप्पी साधकर इसे और पनपने देता है।

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