श्मशान की गरिमा पर 'प्रशासनिक प्रहार', मोक्ष के स्थान पर गौशाला का चारागाह : अंतिम संस्कार के पवित्र परिसर में अब भूसे का अंबार, दानदाताओं की सेवा भावना पर चढ़ा 'अफसरशाही का ग्रहण'
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नैनपुर। जीवन का अंतिम पड़ाव जहां शांति, गरिमा और सम्मान की अपेक्षा रखता है, नैनपुर में वही स्थान आज एक बड़ी प्रशासनिक विडंबना और विवाद का केंद्र बन गया है। नगर के वार्ड क्रमांक 14 स्थित श्मशान घाट को नगरपालिका द्वारा गौशाला में तब्दील कर देने के निर्णय ने नागरिकों के भीतर गहरे आक्रोश को जन्म दिया है। जिस भूमि को वर्षों पहले एक प्रतिष्ठित परिवार ने समाज के पवित्र अंतिम संस्कार कार्यों के लिए दान दिया था, आज उसी स्थान पर गौशाला का संचालन कर उसकी पवित्रता को तार-तार किया जा रहा है। स्थानीय लोगों और समाजसेवियों का आरोप है कि श्मशान जैसी संवेदनशील जगह पर गायों के लिए भूसा और चारा गिराना और वहां अन्य व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा देना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि यह उन भावनाओं का भी अपमान है, जिनके साथ यह भूमि दान की गई थी। लोगों का सवाल है कि गौ-सेवा जैसा पुण्य कार्य, जो पूरे नगर का गौरव हो सकता था, उसे श्मशान की आड़ में क्यों किया जा रहा है?

बारिश में भीगती अंतिम यात्राओं का दर्द और दानदाताओं के नेक इरादों पर नगरपालिका की 'इंजीनियरी' अड़चन
नगरपालिका की लापरवाही केवल गौशाला के संचालन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि श्मशान की बदहाल होती मूलभूत सुविधाओं ने तो स्थानीय निवासियों के लिए जीना मुश्किल कर दिया है। हाल ही में हुई मूसलाधार बारिश के दौरान एक शोकाकुल परिवार को जो अपमान और कठिनाई झेलनी पड़ी, वह प्रशासनिक संवेदनहीनता का जीता-जागता सबूत है। सुरक्षित शेड के अभाव में परिजनों को बारिश के बीच अंतिम संस्कार करने को मजबूर होना पड़ा, जिससे उनकी पीड़ा और बढ़ गई। इस भयावह स्थिति के बावजूद, नगर प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस परिवार ने समाज के लिए यह भूमि दी थी, वे आज अपने निजी खर्च से इन तीन पुराने और जर्जर शेडों को नए और आधुनिक स्वरूप में बनवाने की इच्छा जता रहे हैं। लेकिन, नगरपालिका के इंजीनियरों ने 'तकनीकी एस्टीमेट' और फाइलों की जटिल प्रक्रिया का हवाला देकर इस नेक काम की फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। क्या किसी समाजसेवक द्वारा समाज की मदद करने पर प्रशासन को अड़चन पैदा करनी चाहिए? यह सवाल आज पूरे नैनपुर की जुबान पर है।

सफाई से लेकर मार्ग तक की घोर उपेक्षा: क्या श्मशान की पवित्रता बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगा प्रशासन?
स्थिति की भयावहता केवल वार्ड 14 तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वार्ड क्रमांक 6 के श्मशान घाट की हालत और भी ज्यादा दयनीय है। वहां पहुंचने के लिए न तो कोई सम्मानजनक रास्ता है और न ही अंतिम संस्कार के लिए आने वाले लोगों के बैठने की उचित व्यवस्था। बारिश के मौसम में पूरा परिसर कीचड़ और गंदगी के दलदल में तब्दील हो जाता है। न तो वहां प्रकाश के इंतजाम हैं, न ही अंतिम संस्कार सामग्री को सुरक्षित रखने के लिए कोई स्थान। नगर के प्रमुख श्मशान घाटों की यह बदहाली यह बताने के लिए काफी है कि प्रशासन की प्राथमिकता सूची में 'अंतिम संस्कार' जैसी संवेदनशील सेवाएं अंतिम स्थान पर भी नहीं हैं। श्मशान घाट पर नियमित सफाई, जल निकासी, और बुनियादी सुविधाओं की कमी ने नागरिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर टैक्स के रूप में दी गई उनकी गाढ़ी कमाई कहाँ खर्च की जा रही है?

नगरपालिका से जनता के तीखे सवाल: अब आर-पार की लड़ाई के मूड में नैनपुर
नगरपालिका की कार्यशैली पर उठ रहे इन सवालों के बीच अब जनता का संयम जवाब देता दिख रहा है। नागरिकों ने स्पष्ट मांग की है कि श्मशान घाट परिसर से गौशाला को तत्काल किसी अन्य उपयुक्त और सरकारी भूमि पर स्थानांतरित किया जाए ताकि श्मशान की मूल गरिमा बहाल हो सके। इसके साथ ही, दानदाताओं की भावना का सम्मान करते हुए शेड निर्माण की अनुमति दी जाए और दोनों प्रमुख श्मशान घाटों में मूलभूत सुविधाओं का विकास किया जाए। 'खबरी चाचा' के इस अभियान के माध्यम से नैनपुर के नागरिक यह चेतावनी दे रहे हैं कि यदि प्रशासन ने समय रहते श्मशान की गरिमा और समाज की भावनाओं का सम्मान नहीं किया, तो आने वाले दिनों में यह जनाक्रोश एक बड़े आंदोलन का रूप ले लेगा। सवाल अब यह है कि क्या नगरपालिका के जिम्मेदार अधिकारी अपनी जिम्मेदारी समझेंगे या फिर श्मशान की बदहाली और गौशाला के बहाने चलती राजनीति का यह खेल यूं ही जारी रहेगा?